राजस्थान के एक छोटे से गाँव में एक व्यक्ति रहता था। उसका नाम भोलाराम था। भोलाराम बहुत ही सरल स्वभाव का और मेहनती व्यक्ति था, परंतु जीवन में बार-बार आने वाली परेशानियों ने उसे अंदर से तोड़कर रख दिया था। कभी आर्थिक तंगी, कभी पारिवारिक कलह, कभी समाज का तिरस्कार – समस्याएं जैसे उसका पीछा ही नहीं छोड़ती थीं। दिन-ब-दिन वह और अधिक चिंतित व उदास रहने लगा।
एक दिन गाँव में खबर फैली कि कुछ साधु-संत अपनी मंडली के साथ गाँव में पधारे हैं। वे न केवल योग-साधना करते हैं बल्कि जीवन की गूढ़ बातों को भी सरल भाषा में समझाते हैं। यह सुनते ही भोलाराम के मन में आशा की एक किरण जगी। उसने सोचा कि शायद ये साधु उसकी समस्याओं का कोई समाधान बता सकें।
अगले दिन वह साधुओं की शरण में गया। प्रमुख साधु महाराज एक शांत, तेजस्वी और गंभीर व्यक्तित्व वाले महात्मा थे। भोलाराम ने उन्हें प्रणाम किया और कहा,
“हे महाराज! मेरे जीवन में इतनी समस्याएं हैं कि मैं अब जीने की आशा ही खो बैठा हूँ। ऐसा लगता है जैसे सारी दुनिया की परेशानियाँ मेरे ही हिस्से में आ गई हैं। कृपया मेरी कुछ मदद कीजिए।”
साधु महाराज थोड़ी देर तक चुप रहे, फिर बोले,
“भोलाराम, कल सुबह पुनः हमारे पास आना। तब मैं तुम्हारी समस्या का हल बताऊँगा।”
भोलाराम अगली सुबह समय से साधुओं के पास पहुँच गया। साधु महाराज ने कहा,
“हमारी मंडली में 100 ऊँट हैं। आज रात तुम्हें इन 100 ऊँटों की रखवाली करनी है। जब सभी ऊँट एक साथ बैठ जाएँ, तभी तुम सोना।”
भोलाराम को यह काम सरल लगा। उसने सोचा – “बस ऊँटों को बैठाना है, यह कौन सा बड़ा काम है।” रात होते ही वह ऊँटों की रखवाली में लग गया। शुरुआत में कुछ ऊँट बैठे थे और कुछ खड़े। उसने जो ऊँट खड़े थे, उन्हें बैठाने का प्रयास किया। जैसे ही वे बैठे, कुछ पहले से बैठे ऊँट खड़े हो गए।
यह सिलसिला रात भर चलता रहा। वह कभी एक ऊँट को बैठाता, तो कोई दूसरा खड़ा हो जाता। पूरी रात उसने एक साथ 100 के 100 ऊँटों को बैठते हुए नहीं देखा। थक-हारकर, बेचैनी में रात कट गई और वह सुबह साधु महाराज के पास पहुँचा।
साधु ने मुस्कराते हुए पूछा,
“कैसी रही रात? आराम मिला?”
भोलाराम ने थके स्वर में कहा,
“महाराज! सारी रात जागता रहा। ऊँट कभी भी एक साथ नहीं बैठे। एक को बैठाता तो दूसरा खड़ा हो जाता। कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि सब एक साथ बैठ जाएं। मैं पूरी रात परेशान होता रहा।”
साधु महाराज अब गंभीर हो गए और बोले,
“यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है, भोलाराम! जीवन के ऊँट भी ऐसे ही होते हैं – समस्याएं कभी एक साथ समाप्त नहीं होतीं। एक जाती है तो दूसरी आ जाती है। कुछ समस्याओं को तुम सुलझा लोगे, लेकिन कुछ नई फिर खड़ी हो जाएंगी। यदि तुम यह सोचते रहोगे कि जब सारी समस्याएं समाप्त होंगी तब चैन से जीऊँगा, तो वह दिन कभी नहीं आएगा। चैन और सुख वहीं है जहाँ धैर्य और समझदारी है।”
भोलाराम अब सब समझ चुका था। उसकी आंखों में आत्मबोध की चमक थी। उसने साधु महाराज को प्रणाम किया और कहा,
“महाराज! आपने मेरी आँखें खोल दीं। अब मैं जीवन की हर समस्या का सामना संयम और धैर्य से करूंगा।”
हम सभी के जीवन में समस्याएं आती रहती हैं। कोई भी जीवन पूर्णतः समस्या-मुक्त नहीं होता। जैसे ऊँट कभी एक साथ नहीं बैठते, वैसे ही जीवन की परेशानियाँ कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं। परंतु अगर हम हर परिस्थिति में धैर्य और समझदारी बनाए रखें, तो जीवन सरल और सुंदर हो सकता है।
समस्याएं जीवन का हिस्सा हैं – उनसे डरिए मत, उन्हें समझिए और सहनशीलता से आगे बढ़िए।