बुरी नजर लगने की मान्यता क्यों?

संसार के लगभग सभी देशों में बुरी नजर लगने के प्रभाव को जाना जाता है। जीवित प्राणियों पर ही नहीं वरन् निर्जीव पदार्थ तक बुरी नजर लगने पर विकारग्रस्त हो जाते हैं। सुंदर वस्तुएं खो जाती हैं, नष्ट हो जाती हैं। यहां तक कि सुंदर प्रतिमा बुरी नजर प्रभाव से खंडित होती देखी गई है। बिना किसी पूर्व रोग के एकाएक बच्चा बीमार पड़ जाता है। दुधारू पशु-गाय, भैंस आदि को जब बुरी नजर लग जाती है, तो उसका दूध सूख जाता है।

बुरी नजर लगने का आशय यह है कि जब कोई व्यक्ति अत्यधिक दुर्भावना या आकर्षण से एकाग्र होकर किसी व्यक्ति या वस्तु को देखता है, तो उसकी बेधक दृष्टि उस वस्तु पर दुष्प्रभाव डालती है। भूखे व्यक्ति की कुटृष्टि आपके भोजन को विषैला बना सकती है। अतः भोजन जहां तक हो सके, अजनबियों के बीच न करें।

आमतौर पर बुरी नजर का प्रभाव कोमल चित्त वाले, बच्चों, महिलाओं और पालतू जानवरों पर देखा जाता है। इसके अलावा मकान, उद्योग, व्यापार, वाहन, दुकान आदि पर भी बुरी नजर का असर होता है। बच्चों पर बुरी नजर का प्रभाव शैशवावस्था में अधिक होता है। बुरी नजर के प्रभाव से अच्छा भला बच्चा देखते-देखते ही बीमार पड़ जाता है। वह दूध पीना छोड़कर अधिक रोता है। चिड़चिड़ा हो जाता है, ज्वर आ जाता है। उसकी आंखें चढ़ी हुई-सी रहती हैं। पलकों की बरौनियां खड़ी तथा मुंह से खट्टी गंध आने लगती है। अपच की शिकायत हो जाती है।

महिलाओं पर बुरी नजर का प्रभाव विवाह के समय, गर्भावस्था में बच्चा होने के बाद के समय में अकसर होता है। वयस्क व्यक्ति को जब बुरी नजर लगती है, तो उसे मानसिक तनाव, बेचैनी, अशांति का अनुभव, शरीर की पीड़ा, ज्वर, मंदाग्नि आदि तकलीफें महसूस होती हैं।

बुरी नजर लगने के मूल में वैज्ञानिकों ने मानवीय विद्युत का अहितकर प्रभाव माना है। किसी-किसी व्यक्ति की दूषित दृष्टि इतनी बेधक होती है कि उससे बच्चे की शक्ति खिंचती है और वे उसके झटके को बर्दाश्त न करके बीमार हो जाते हैं। ऐसा देखा गया है कि अजगर अपनी दृष्टि से आकाश से पक्षियों को अपनी ओर खींच लेता है। भेड़िए की दृष्टि से भेड़ और बिल्ली की दृष्टि से कबूतर इतने अशक्त हो जाते हैं कि भाग तक नहीं सकते। इसी को आंखों की आकर्षण शक्ति का सम्मोहन कहते हैं।

नजर से बचाने के लिए काले टीके का या काले धागे के प्रयोग के पीछे मान्यता यह है कि यह विद्युत् का सुचालक होता है। आमतौर पर देखने में आया है कि आकाश की बिजली अकसर काले आदमी, जानवर, सांप या अन्य काली वस्तुओं पर पड़ती है। जाड़े के दिनों में काले कपड़े अधिक गर्मी सोखते हैं। इसीलिए बच्चों को कपाल, हाथ-पैरों में और आंखों में काजल लगाया जाता है। पैर, हाथ, गले, कमर में काला डोरा बांधा जाता है। काली बकरी का दूध पिलाया जाना और काली भस्म चटाना जैसे सभी कार्यों का उद्देश्य नजर के दुष्प्रभाव से बचाने की शक्ति ग्रहण करना है। बुरी नजर से बचने के लिए शेर का नाखून, नीलकंठ का पर, मूंज या तांबे का ताबीज गले में पहना जाता है। दुकानदार नीबू और हरी मिर्चे दुकान में लटका कर रखते हैं। ट्रक मालिक ट्रक के पीछे जूता लटकाते हैं। कारखाने वाले प्रवेश द्वार पर घोड़े की नाल लगाते हैं। मकान पर काली हंडिया टांगी जाती है। यह नजर की एकाग्रता भंग करने की दृष्टि से किया जाता है।

श्रद्धा और विश्वास

कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र को विशाल सेनाओं के आवागमन की सुविधा के लिए तैयार किया जा रहा था। उन्होंने हाथियों का इस्तेमाल पेड़ों को उखाड़ने और जमीन साफ करने के लिए किया। ऐसे ही एक पेड़ पर एक गौरैया अपने चार बच्चों के साथ रहती थी।

जब उस पेड़ को उखाड़ा जा रहा था तो उसका घोंसला जमीन पर गिर गया, लेकिन चमत्कारी रूप से उसकी संताने अनहोनी से बच गई। लेकिन वो अभी बहुत छोटे होने के कारण उड़ने में असमर्थ थे।

कमजोर और भयभीत गौरैया मदद के लिए इधर-उधर देखती रही। तभी उसने कृष्ण को अर्जुन के साथ वहा आते देखा। वे युद्ध के मैदान की जांच करने और युद्ध की शुरुआत से पहले जीतने की रणनीति तैयार करने के लिए वहां गए थे। उसने कृष्ण के रथ तक पहुँचने के लिए अपने छोटे पंख फड़फड़ाए और किसी प्रकार श्री कृष्ण के पास पहुंची।

“हे कृष्ण ! कृपया मेरे बच्चों को बचाये , क्योकि लड़ाई शुरू होने पर कल उन्हें कुचल दिया जायेगा। ”सर्व व्यापी भगवन बोले “मैं तुम्हारी बात सुन रहा हूं, लेकिन मैं प्रकृति के कानून में हस्तक्षेप नहीं कर सकता !”

गौरैया ने कहा “हे भगवान ! मै जानती हूँ कि आप मेरे उद्धारकर्ता हैं, मैं अपने बच्चों के भाग्य को आपके हाथों में सौंपती हूं। अब यह आपके ऊपर है कि आप उन्हें मारते हैं या उन्हें बचाते हैं !”

“काल चक्र पर किसी का बस नहीं है,” श्री कृष्ण ने एक साधारण व्यक्ति की तरह उससे बात की जिसका आशय था कि वहा ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके बारे में वो कुछ भी कर सकते थे।

गौरैया ने विश्वास और श्रद्धा के साथ कहा “प्रभु, आप कैसे और क्या करते है वो मै नहीं जान सकती,”। “आप स्वयं काल के नियंता हैं, यह मुझे पता है। मैं सारी स्थिति एवं परिस्थति एवं स्वयं को परिवार सहित आपको समर्पण करती हूं !”

भगवान बोले, “अपने घोंसले में तीन सप्ताह के लिए भोजन का संग्रह करो। ”गौरैया और श्री कृष्ण के संवाद से अनभिज्ञ अर्जुन गौरैया को दूर भगाने की कोशिश करते है। गौरैया ने अपने पंखों को कुछ मिनटों के लिए फुलाया और फिर अपने घोंसले में वापस चली गई।

दो दिन बाद, शंख के उदघोष से युद्ध शुरू होने की घोषणा की गई। कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि अपने धनुष और बाण मुझे दो। अर्जुन चौंका ! क्योंकि कृष्ण ने युद्ध में कोई भी हथियार नहीं उठाने की शपथ ली थी। इसके अतिरिक्त, अर्जुन का मानना था कि वह ही सबसे अच्छा धनुर्धर है।

“मुझे आज्ञा दें, भगवन ! “अर्जुन ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा, मेरे तीरों के लिए कुछ भी अभेद्य नहीं है। चुपचाप अर्जुन से धनुष लेकर कृष्ण ने एक हाथी को निशाना बनाया। लेकिन, हाथी को मार के नीचे गिराने के बजाय तीर हाथी के गले की घंटी में जा टकराया और एक चिंगारी सी उड़ गई।

अर्जुन ये देख कर अपनी हंसी नहीं रोक पाया कि कृष्ण एक आसान सा निशान चूक गए। “क्या मैं प्रयास करू?” उसने स्वयं को प्रस्तुत किया। उसकी प्रतिक्रिया को नजरअंदाज करते हुए, कृष्ण ने उन्हें धनुष वापस दिया और कहा कि कोई और कार्रवाई आवश्यक नहीं है ! “लेकिन केशव तुमने हाथी को क्यों तीर मारा ? अर्जुन ने पूछा।

क्योंकि इस हाथी ने उस गौरैया के आश्रय उसके घोंसले को जो कि एक पेड़ पर था उसको गिरा दिया था। “कौन सी गौरैया ?” अर्जुन ने पूछा। “इसके अतिरिक्त, हाथी तो अभी स्वस्थ और जीवित है। केवल घंटी ही टूट कर गिरी है !” अर्जुन के सवालों को खारिज करते हुए, कृष्ण ने उसे शंख फूंकने का निर्देश दिया।

युद्ध शुरू हुआ, अगले अठारह दिनों में कई जानें चली गईं। अंत में पांडवों की जीत हुई। एक बार फिर कृष्ण अर्जुन को अपने साथ सुदूर क्षेत्र में भ्रमण करने के लिए ले गए। कई शव अभी भी वहाँ हैं, जो उनके अंतिम संस्कार का इंतजार कर रहे हैं। जंग का मैदान गंभीर अंगों और सिर, बेजान सीढ़ियों और हाथियों से अटा पड़ा था। कृष्ण एक निश्चित स्थान पर रुके और एक घंटी जो कि हाथी पर बाँधी जाती थी उसे देख कर विचार करने लगे।

“अर्जुन !” उन्होंने कहा, “क्या आप मेरे लिए यह घंटी उठाएंगे और इसे एक तरफ रख देंगे ?” निर्देश बिलकुल सरल था परन्तु अर्जुन के समझ में नहीं आया। आख़िरकार विशाल मैदान में जहाँ बहुत सी अन्य चीज़ों को साफ़ करने की ज़रूरत थी, कृष्ण उसे धातु के एक टुकड़े को रास्ते से हटाने के लिए क्यों कहेंगे ?

उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा। “हाँ, यह घंटी !” कृष्ण ने दोहराया। “यह वही घंटी है जो हाथी की गर्दन पर पड़ी थी, जिस पर मैंने तीर मारा था।”

अर्जुन बिना किसी और सवाल के भारी घंटी उठाने के लिए नीचे झुका। जैसे ही उन्होंने इसे उठाया, उसकी हमेशा के लिए जैसे दुनिया बदल गई…..! एक, दो, तीन, चार और पांच। चार युवा पक्षियों और उसके बाद एक गौरैया उस घंटी के नीचे से निकले। बाहर निकल के माँ और छोटे पक्षी कृष्ण के इर्द-गिर्द मंडराने लगे एवं बड़े आनंद से उनकी परिक्रमा करने लगे। अठारह दिन पहले काटी गई एक घंटी ने पूरे परिवार की रक्षा की थी।

“मुझे क्षमा करें हे कृष्ण ! अर्जुन ने कहा, “आपको मानव शरीर में देखकर और सामान्य मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हुए, मैं भूल गया था कि आप वास्तव में कौन हैं ?”

आइये हम भी तब तक इस घंटी रूपी घर मे परिवार के साथ संयम के साथ अन्न, जल ग्रहण करते हुए, प्रभु के प्रति आस्था रखते हुए विश्राम करें जब तक ये घंटी हमारे लिए उठाई न जाये..! !!

सदैव प्रसन्न रहिये ! जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है ! !!
जिसका मन मस्त है, उसके पास समस्त है ! !!

आज का राशिफल – 05 जुलाई, 2024, शुक्रवार


मेष राशि : वित्तीय लाभ प्राप्त हो सकते हैं और नई साझेदारी भी होने की संभावना है। लेकिन बढ़े हुए व्यय के कारण साझेदारी में कुछ समस्याएं पनप सकती है। सामाजिक कुछ लोग आप के किये कार्यों से नाखुश रहेंगे। आज कार्यों को परिजनों में प्रशंसा मिलेगी। मन में उत्साह बढ़ेगा, जिससे कार्य की गति बढ़ेगी। खर्चों में कमी करें, कानूनी विवाद निपटेंगे।

वृष राशि : नौकरीपेशा जातकों को अधिकारियों के साथ अपने संबंधों के मामले में कठिन समय का सामना करना पड़ सकता है। अपने बॉस पर हावी होने की कोशिश न करें, वरना आप खुद मुसीबत में पड़ सकते हैं। आप की दिनचर्या में बदलाव होगा। भागीदारी में आपके द्वारा लिए गए निर्णयों से लाभ संभव है। रचनात्मक अथवा व्यापारिक कार्यों से आर्थिक लाभ होगा। नवीन योजनाओं में निवेश संभव है।

मिथुन राशि : सामान्य रूप से लोगों के साथ आपके संबंध बेहतर होंगे और आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी। यह अवधि निवेश प्रयासों के लिए भी परिपक्व है। व्यापार-व्यवसाय अनुकूल रहेगा। परिवार में तनाव से चिंता बढ़ेगी। जीवनसाथी के स्वास्थ्य की चिंता रह सकती है। परोपकार में रुचि बढ़ेगी। धर्म-कर्म में समय व्यतीत होगा। लक्ष्मी जी को सौंदर्य सामग्री अर्पण करें। आपकी हर मनोकामना पूरी होगी।

कर्क राशि : लाभप्रद सौदे हाथ लगेंगे। प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण व्यक्तियों से आपका मिलना होगा और इससे आपको फायदा भी होगा। आप को पारिवारिक जिम्मेदारी बढऩे से व्यस्तता बढ़ेगी। आज कार्य में नवीनता के भी योग हैं। संतान के व्यवहार से समाज में सम्मान बढ़ेगा। दिन अनुकूल रहेगा। व्यापार में सफलता मिलेगी और कीर्ति बढ़ेगी।

सिंह राशि : शत्रु आपका कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे। आर्थिक संचय में वृद्धि मन्द गति से हो सकती है। आप की मेहनत के अनुरूप सफलता मिलने में संदेह है। आज किसी हनुमान मंदिर में जाकर सिंदूर और तेल अर्पण करें, सभी रुके कार्य पूर्ण होंगे। आपको सफलता प्राप्त होगी। दूसरों के झंझटों में न पड़ें।

कन्या राशि : आपके सम्मान और प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। बिना सोच विचार के कोई भी काम न करें। आप अपनी योग्यता को साबित करने के लिए बेहतर अवसरों का सुचारू रूप से लाभ उठाएंगे। मांगलिक आयोजनों के लिए रूपरेखा में परिवर्तन होगा। अच्छे कार्यों के लाभकारी परिणाम मिलेंगे। सामाजिक समारोहों में भाग ले सकते हैं। विरोधियों से सावधान रहें।

तुला राशि : आकस्मिक लाभ के अलावा साझेदारी से आपके लिए कुछ बेहतरीन प्रोत्साहन मिल सकते हैं, जो आपकी वित्तीय स्थिति को काफी मजबूत कर सकते हैं। आलस्य से बचकर रहें, वरना बने बनाए काम बिगड़ जाएंगे। कार्यों में रुकावट आ सकती है। कार्यस्थल पर किसी के भरोसे न रहकर अपना कार्य स्वयं करें।

वृश्चिक राशि : वित्तीय मामलों के लिए दिन अच्छा है। निवेश और बचत की योजनाएं भी बन जाएंगी। दिन की शुरुआत आनंदप्रद रहेगी। नौकरी में पदोन्नति के योग बन रहे हैं। जो आपके हितचिंतक रहेंगे उनसे आपकी भेंट होगी। व्यापार-नौकरी में लाभ होगा। कीर्ति बढ़ेगी।

धनु राशि : वित्तीय मामले बिना किसी बाधा के आसानी से आगे बढ़ेंगे। जिसे आप किसी काम का नहीं समझते थे, आज वही आप के कार्यों में सहभागी बनेगा। यात्रा का योग बन रहा है। रिश्तेदारों से संपत्ति संबंधी विवाद बड़ा रूप ले सकते है, सतर्क रहें। आज कार्य सिद्धि होंगे।

मकर राशि : क्षमताओं का प्रदर्शन करने के लिए पर्याप्त अवसर मिलेंगे। राजनेताओं को नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं। आज आपका दिन मध्यम है। संतान की आजीविका संबंधी समस्या का हल होगा। किसी शुभचिंतक से मेल-मुलाकात और आत्मबल में मजबूती आयेगी। लापरवाही से काम न करें। वाहन सुख संभव है।

कुम्भ राशि : अविवाहित युवक और युवतियों को अपना जीवनसाथी मिल सकता है।आलस्य त्यागें और समय पर अपना काम करें। आप की मेहनत से व्यापार-व्यवसाय लाभप्रद रहेगा। सश्रम किए गए कार्य सफल होंगे। पारिवारिक कष्ट एवं समस्याओं का अंत संभव है। आय से अधिक व्यय न करें। माता को काजल और कमल गट्टे की माला अर्पण करें, शत्रु परास्त होंगे। आर्थिक स्थिति मज़बूत होगी।

मीन राशि : त्वरित पैसा बनाने की योजनाओं या आकर्षक प्रस्तावों से दूर रहना बेहतर है। इससे आने वाले महीनों में समस्या हो सकती है। आज आकस्मिक लाभ हो सकता है। निकटजनों की प्रगति से मन में प्रसन्नता बनी रहेगी। परिश्रम से स्वयं के कार्यों में भी शुभ परिणाम मिलने की उम्मीद है। विदेश जाने के योग बनेंगे।

आषाढ़ अमावस्या आज, इन चीजों का करें दान, पितर होंगे प्रसन्न

हर महीने कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि के अगले दिन अमावस्या तिथि पड़ती है। आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को आषाढ़ अमावस्या कहलाती है । आषाढ़ अमावस्या के दिन स्नान और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और सभी प्रकार के पाप का नाश होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या के दिन पितृ लोक से पितर पृथ्वी पर आते हैं और उम्मीद करते हैं कि अपने वंश से उनको तृप्त किया जाएगा। इस वजह से अमावस्या के दिन पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध कर्म आदि करते हैं। इस बार आषाढ़ मास की अमावस्या 5 जुलाई, शुक्रवार को पड़ेगी। अमावस्या की तिथि भगवान विष्णु और पितरों को समर्पित है। इस दिन गंगा स्नान के साथ जप, तप और दान भी किया किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या पर श्री हरि और पितरों की पूजा करने से जातक के जीवन में खुशियों का आगमन होता है और साथ ही पितृ देव प्रसन्न होते हैं।

आषाढ़ अमावस्या पर करें इन चीजों का दान

पितरों की कृपा करने के लिए आषाढ़ अमावस्या पर श्रद्धा अनुसार गरीब लोगों को अन्न और धन का दान करें।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अमावस्या पर इन चीजों का दान करने से जातक को पूर्वजों की कृपा प्राप्त होती है।
इसके अलावा गेहूं और चावल का भी दान कर सकते हैं, मान्यता है कि ऐसा करने से पितरों के साथ सूर्य देव की कृपा प्राप्त होती है।
नाराज पितरों को प्रसन्न करने के लिए अमावस्या के दिन पूजा-अर्चना करने के बाद भूमि का दान करें। शास्त्रों में भूमि दान को महादान माना गया है। भूमि दान करने से इंसान को पापों से छुटकारा मिलता है।
आषाढ़ अमावस्या पर आंवला, दूध, घी और दही समेत विशेष चीजों कर दान कर सकते हैं।
ऐसा कहा जाता है कि इन चीजों का दान करने से आर्थिक तंगी दूर होती है और धन लाभ के योग बनते हैं।

आषाढ़ अमावस्या की तिथि

पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि 05 जुलाई 2024 को प्रातः 04 बजकर 57 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इसका समापन अगले दिन यानी 06 जुलाई को प्रातः 04: 26 मिनट पर होगा। ऐसे में आषाढ़ अमावस्या 05 जुलाई 2024 को मनाई जाएगी।

आषाढ़ अमावस्या 2024 स्नान मुहूर्त

5 जुलाई को आषाढ़ अमावस्या के दिन आपके लिए स्नान का शुभ समय ब्रह्म मुहूर्त है। ब्रह्म मुहूर्त तड़के 04:08 से 04:48 तक है।

आषाढ़ अमावस्या 2024 तर्पण और श्राद्ध का समय

यदि आप अपने पितरों को खुश करने के लिए उनका श्राद्ध कर्म करना चाहते हैं तो आषाढ़ अमावस्या के दिन प्रातः 11:00 बजे से लेकर दोपहर 02:30 बजे के बीच कर सकते हैं। पितरों के लिए जल से तर्पण दें। कुश, काले तिल, सफेद फूल और जल से पितरों के लिए तर्पण देना चाहिए।

आज का राशिफल – 03 जुलाई, 2024, बुधवार


मेष राशि : जो भी करें, दिल से करें। धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी। लोगों से प्रोत्साहन मिलेगा। पारिवारिक रिश्ते मजबूत होंगे। मित्रों के साथ समय व्यतीत होगा। बुरी संगत छोड़ दें अन्यथा नुकसान होगा।

वृषभ राशि : कार्यस्थल पर जो लोग आप को पसंद नहीं करते थे, वे आप के कार्यों की तारीफ करेंगे। कार्य पूर्ण करने के लिए किसी की मदद लेना होगी। बिना पूछे अपनी राय न दें।

मिथुन राशि : तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। बेहतर होगा कहीं घूमने चले जायें। आपके अपनों को आप की जरूरत है। मौज- मस्ती पर खर्च होगा। पिता के व्यवहार में परिवर्तन से चिंतित रहेंगे।

कर्क राशि : अकारण किसी विवाद में फंस सकते हैं। मानसिकता को बदलने की बेहत जरूरत है। उन्नति में बाधा आयेगी। कोई खुशखबरी सुन सकते हैं। यात्रा सुखद रहेगी।

सिंह राशि : नौकरी बदलने का मन बना चुके हैं। किसी की सिफारिश से कार्य हो सकता है। संचित धन का निवेश लाभप्रद रहेगा। किसी के बहकावे में आने से रिश्ते कमजोर होंगे। संतान सुख की प्राप्ति संभव है।

कन्या राशि : दिन की शुरुआत में मन उदास रहेगा। किसी विषय को समझने की जिज्ञासा रहेगी। अपने अधीनस्थों के किए कार्यों की सराहना करें, लाभ होगा।

तुला राशि : विवादित मामलों में विजय प्राप्त होगी। कुछ नया सीखने को मिलेगा। जिंदगी से जुड़ी निजी बातें आज सामने आ सकती है। नौकरी में उत्साह की कमी रहेगी।

वृश्चिक राशि : प्रतियोगिता में सफल होंगे। जीवनसाथी के साथ मतभेद संभव हैं। अपने कार्य के प्रति ईमानदार रहें। मनचाहा जवाब न मिलने से निराश रहेंगे।

धनु राशि : नकारात्मक सोच से निराशा मिलेगी। स्वयं अपने आप पर से नियंत्रण खो देंगे। मित्रों से मतभेद हो सकते हैं। कार्यस्थल पर जन हानि के योग हैं। इष्ट बल मजबूत करें।

मकर राशि : अपने प्रोफेशन से आप न खुश हैं, समय के साथ स्थिति आप के अनुकूल बनेगी। जीवनसाथी का व्यवहार मनोबल बढ़ायेगा। कर्ज लेने की स्थिति निर्मित हो सकती है।

कुम्भ राशि : जरूरतमंद लोगों की मदद करें। मांगलिक कार्यक्रमों की रूपरेखा बनेगी। राजनेतिक कार्यक्रमों में शामिल होंगे। पैसों का लेन-देन संभव है। खान-पान पर ध्यान दें। स्वास्थ्य बिगड़ सकता है।

मीन राशि : घरेलू कार्यों में व्यस्त रहेंगे। विद्यार्थी परिणामों को लेकर चिंतित रहेंगे। मेहमानों का आगमान हो सकता है। जमीन जायदाद के मसले निपटेंगे। धन कमाने की चाह में कोई गलत फैसले न लें।

प्रदोष व्रत 2024 – जानें तिथि और शुभ मुहूर्त

प्रदोष व्रत मुख्यतः भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित है। इस दिन साधक महादेव की कृपा प्राप्ति के लिए व्रत रखते हैं और विधि-विधान के साथ महादेव की पूजा-अर्चना करते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि प्रदोष व्रत में किन चीजों का दान करने से साधक को महादेव की विशेष कृपा प्राप्त हो सकती है।

प्रदोष व्रत के दिन की जाती है भगवान शिव की पूजा।
प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है प्रदोष व्रत।
जानिए, प्रदोष व्रत पर किन चीजों के दान से मिलता है लाभ।

पंचांग के अनुसार जब त्रयोदशी तिथि प्रदोष काल के काल में लगती है तो उस दिन भगवान शिव को समर्पित प्रदोष व्रत रखा जाता है। हर माह में दो बार प्रदोष व्रत किया जाता है, एक कृष्ण पक्ष में और दूसरा शुक्ल पक्ष में।

प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त

वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 3 जुलाई को प्रात: 7 बजकर 10 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 4 जुलाई प्रात: 5 बजकर 54 मिनट पर होगा। इस दिन प्रदोष काल में पूजा लाभकारी मानी जाती है। इस वजह से इस बार यह व्रत 3 जुलाई के दिन बुधवार को रखा जाएगा।

करें इन चीजों का दान

अन्न दान को हिंदू धर्म में सबसे उत्तम दान माना गया है। ऐसे में आप प्रदोष व्रत के दिन किसी जरूरतमंद को अन्न का दान कर सकते हैं। इससे साधक पर महादेव की कृपा बरसती है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

दान करें इस तरह के वस्त्र

प्रदोष व्रत के दिन सफेद रंग के वस्त्रों का दान करना चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति के मान-सम्मान में वृद्धि होती है। साथ ही साधक को करियर में सफलता प्राप्त होती है। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि पुराने वस्त्रों का दान नहीं करना चाहिए।

बरसेगी महादेव की कृपा

प्रदोष व्रत के दिन उड़द दाल का दान करना बहुत ही लाभकारी माना गया है। ऐसा करने से व्यापार-व्यवसाय में लाभ के योग बनते हैं। वहीं, सोमवार और प्रदोष व्रत के दिन सफेद चीजें जैसे चीनी, चावल और दूध का दान करना अच्छा माना जाता है। इससे जातक की कुंडली में चन्द्रमा मजबूत होता है।

शुक्र प्रदोष व्रत कथा

प्राचीन समय में किसी नगर में तीन मित्र निवास करते थे। उनमें एक राजकुमार, एक ब्राह्मण कुमार और एक घनिक पुत्र था। तीनों मित्रों का विवाह हो चुका था। घनिक पुत्र का गौना नहीं हुआ था। एक दिन तीनों मित्र अपनी अपनी पत्नी की चर्चा कर रहे थे। ब्राह्मण कुमार ने कहा जिस घर में स्त्री नहीं होती है वहां भूतों का वास होता है। यह सुनकर घनिक पुत्र अपनी पत्नी को तुरंत घर लाने का निश्चय करता है। वह अपनी पत्नी को लाने सुसराल पहुंच गया। लेकिन, शुक्र के अस्त चलने के कारण पत्नी के माता-पिता पुत्री को विदा नहीं करना चाहते थे, धनिक पुत्र उनकी बात नहीं माना और जबरन अपनी पत्नी को साथ ले गया।

रास्ते में बैलगाड़ी का पहिया टूट गया और दोनों घायल हो गए। कुछ दूर बाद उनका सामना डाकुओं से हो गया। डाकुओं ने दोनों को लूट लिया। किसी तरह दोनों घर पहुंचे। घर पहुंचते ही धनिक पुत्र को सांप ने काट लिया। वैद्य ने कहा मृत्यु निश्चित है। यह समाचार जान कर दोनों मित्र वहां पहुंचे और धनिक पुत्र के माता-पिता से शुक्र प्रदोष का व्रत रखने को कहा। उन्होंने बहु और बेटे को साथ उसके माता-पिता के पास भेजने के लिए कहा क्योंकि शुक्र के अस्त होने पर बेटी को विदा नहीं करना चाहिए। धनिक ने ऐसा ही किया। पत्नी के माता-पिता के घर पहंचते ही धनिक पुत्र ठीक हो गया। इस चलते मान्यतानुसार शुक्र प्रदोष व्रत करने से घोर कष्ट भी दूर हो सकते हैं।

काली खांसी से कैसे निजात पाएं?

काली खांसी, जिसे परट्यूसिस (Pertussis) भी कहा जाता है, एक गंभीर और संक्रामक रोग है जो मुख्य रूप से बच्चों को प्रभावित करता है। यह बीमारी बैक्टीरिया Bordetella pertussis के संक्रमण से होती है। काली खांसी का नाम इस बीमारी के विशिष्ट लक्षण, जो कि जोरदार और लगातार खांसी के दौरे होते हैं, के कारण पड़ा है।

लक्षण

  1. प्रारंभिक लक्षण:
    • सर्दी-जुकाम जैसे लक्षण
    • हल्की खांसी
    • नाक बहना
    • हल्का बुखार

तीव्र चरण के लक्षण:

  • जोरदार और लगातार खांसी के दौरे
  • खांसी के बाद गहरी सांस लेने पर ‘कूंक’ की आवाज आना
  • खांसी के दौरान उल्टी होना
  • खांसी के दौरे के कारण थकावट

कारण

काली खांसी का मुख्य कारण Bordetella pertussis नामक बैक्टीरिया है। यह बैक्टीरिया संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से हवा में फैलता है और अन्य लोगों को संक्रमित कर सकता है।

आयुर्वेदिक उपचार

  • तुलसी के पत्ते और कालीमिर्च समान मात्रा में पीस लें। इसकी मूंग के बराबर की गोलियां बना लें। एक-एक गोली को चार बार देना चाहिए। इससे कुकर (काली) खांसी नष्ट हो जाती है।
  • 5 ग्राम कालीमिर्च, 10 ग्राम पिपली और 20 ग्राम अनारदाना को पीसकर इसमें गुड़ मिलाकर चने के आकार की गोलियां बना लें। फिर इन गोलियों को छाया में सुखाकर रख लें। इसकी 1-1 गोली को दिन में 2-3 बार चूसने से काली खांसी दूर हो जाती है
  • केले के सूखे पत्तों को जलाकर राख बना लें। इस राख को थोड़ी सी मात्रा में लेकर शहद में मिलाकर रोगी को दिन में 3-4 बार देने से काली खांसी दूर हो जाती है
  • बड़ी इलायची के दानों को तवे पर भूनकर उसमें बराबर मात्रा में सौंफ, मुलहठी और मुनक्का (बीज निकालकर) पीसकर चूर्ण बना लें। इसके एक चौथाई ग्राम से भी कम चूर्ण को शहद में मिलाकर रोजाना 2-3 बार चाटने से काली खांसी में लाभ मिलता है।
  • 100 से 250 मिलीलीटर काली बकरी का दूध दो सप्ताह तक पिलाने से काली खांसी दूर हो जाती है
  • फिटकरी को दरदरा (मोटा-मोटा) पीसकर तवे पर भूनते समय केले के पेड़ के गूदे का पानी 100 मिलीलीटर थोड़ा-2 कर गेरते जाएं फिर इसे उतारकर ठंड़ा करके पीस लें। इसे एक चौथाई ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम चटाएं। इससे काली खांसी का प्रकोप शान्त हो जाता है।
  • लगभग आधा ग्राम भुनी हुई फिटकरी तथा आधा ग्राम मिश्री को मिलाकर सुबह-शाम रोगी को खिलाने से पांच दिनों में ही कालीखांसी दूर हो जाती है। वयस्कों (बालिग व्यक्तियों) को काली (कुकुर) खांसी होने पर उन्हें दुगुनी मात्रा में देना चाहिए। यदि बिना पानी के निगल न सके तो एक-दो घूंट गर्म पानी ऊपर से पिलाना चाहिए।
  • थोड़ी सी भुनी हुई फिटकरी लेकर इसमें थोड़ी सी शक्कर मिलाकर दिन में 3 बार खाने से 5 दिन में ही खांसी ठीक हो जाती है।
  • एक चौथाई ग्राम से कम मात्रा में फिटकरी की भस्म को सुबह-शाम लगभग आधा ग्राम काकड़ासिंगी के चूर्ण और शहद को मिलाकर देने से बहुत अच्छा लाभ मिलता है।
  • चने की दाल के बराबर पिसी हुई फिटकरी को गर्म पानी से रोजाना 3 बार लेने से कुकुर खांसी ठीक हो जाती है।
  • 10 बून्द पान के पत्तों के रस में शहद मिलाकर 1-1 बार चाटने से काली खांसी में बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  • हल्दी की 3-4 गांठों को तोड़कर तवे पर भूनकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 3-3 ग्राम सुबह-शाम पानी से लेने से कालीखांसी में आराम आता है।
  • तवे को आग पर रखकर लौंग को भून लें, फिर उस लौंग को पीसकर शहद में मिलाकर चाटने से काली खांसी ठीक हो जाती है।
  • थोड़ी-सी लौंग तवे पर भूनकर कूट-पीसकर बारीक चूर्ण बनाकर रखें। इस लौंग के चूर्ण को शहद में मिलाकर चाटने से कालीखांसी दूर हो जाती है।
  • बच्चों को काली खांसी में एक चौथाई ग्राम से कम गोरोचन को सुबह-शाम शहद के साथ चटाने से लाभ मिलता है।
  • गोरोचन शुद्ध होना चाहिए क्योंकि यह मार्केट में बहुत अधिक मात्रा में नकली पाये जाते हैं।
  • सुहागा, कलमीशोरा, फिटकरी, कालानमक और यवक्षार को पीसकर चूर्ण तैयार कर लें। फिर इसे तवे पर भूनकर 2-2 ग्राम की मात्रा में शहद को मिलाकर बच्चों को चटाने से कालीखांसी दूर हो जाती है।
  • तवे पर भुना हुआ सुहागा व वंशलोचन को मिलाकर शहद के साथ रोगी बच्चे को चटाने से कालीखांसी दूर हो जाती है

शनि वक्री 2024

ज्योतिष में कर्मप्रधान और न्यायाधीश कहे जाने वाले शनि महाराज (Shani Maharaj) का महत्वपूर्ण स्थान होता है। इन्हें सबसे क्रूर ग्रह भी माना जाता है, क्योंकि भूल-चूक के लिए शनि देव दंड देने में जरा भी दया नहीं दिखाते हैं। शनि सौरमंडल में सबसे धीमी गति से चलने वाला ग्रह है।

जब-जब शनि देव अपनी चाल बदलते हैं, इसका प्रभाव सभी राशियों पर पड़ता है। फिलहाल शनि देव कुंभ राशि (Aquarius) में उल्टी चाल चल रहे हैं। 29 जून 2024 की मध्यरात्रि 12 बजकर 40 मिनट पर शनि देव कुंभ राशि में वक्री हुए हैं। अब शनि देव पूरे 139 दिनों तक इसी राशि में वक्री या उल्टी चाल चलेंगे। इसके बाद 15 नवंबर 2024 को शनि कुंभ राशि में मार्गी (Shani Margi 2024) हो जाएंगे।

कहा जाता है कि वक्री अवस्था में शनि सामान्य से अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली हो जाते हैं। वक्री अवस्था में कई राशियों को शनि से सकारात्मक परिणाम मिलते हैं, जबकि कुछ राशियों के लिए शनि बेहद कष्टकारी भी साबित हो सकते हैं। आइए जानते हैं कि वक्री अवस्था में शनि पूरे 139 दिनों के लिए किन राशियों को परेशान करेंगे।

वक्री शनि इन राशियों का हाल करेंगे बेहाल!

मकर राशि (Capricorn): शनि की उल्टी चाल का नकारात्मक प्रभाव मकर राशि वालों के जीवन को प्रभावित करेगा। इस दौरान आपको कई जिम्मेदारियां मिलेंगी, जो आपके लिए जोखिमभरी साबित हो सकती हैं। शनि की वक्री अवस्था के दौरान इस राशि वालों को बड़े लेन-देन से सावधानी रखनी चाहिए और स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए। इस समय आपको किसी भी कार्य, जैसे पढ़ाई या इंटरव्यू, के लिए सामान्य से अधिक मेहनत करनी पड़ेगी।

कुंभ राशि (Aquarius): शनि आपकी राशि में ही वक्री हुए हैं, ऐसे में सबसे अधिक कष्ट इसी राशि वालों को झेलना पड़ सकता है। इस समय किसी नए या जरूरी काम की शुरुआत करने से बचना चाहिए और वाद-विवाद जैसी स्थिति से दूर रहना चाहिए। घर-परिवार से लेकर कार्यक्षेत्र में आपको वाणी पर संयम रखने की जरूरत होगी।

मीन राशि (Pisces): इस राशि वाले जातकों को शनि वक्री के दौरान, यानी 15 नवंबर तक, हर काम सावधानी से करना होगा। छोटी सी गलती भी बड़ा नुकसान करा सकती है। शनि के उल्टी चाल चलने से कुंभ राशि वालों को भाग्य का अधिक साथ नहीं मिलेगा। आप मानसिक रूप से परेशान रहेंगे, आय से अधिक व्यय की स्थिति रहेगी और सेहत से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं।

बाबा बर्फानी अमरनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा।

भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है। मान्यता है कि इस गुफा में शंकर ने पार्वती को अमरकथा सुनाई थी, जिसे सुन सद्योजात शुक-शिशु शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गए।

गुफा में आज भी कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई देता है, जिन्हें अमर पक्षी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जिन श्रद्धालुओं को कबूतरों जोड़ा दिखाई देता है, उन्हें शिव-पार्वती दर्शन देते हैं और मोक्ष प्रदान करते हैं।

यह भी माना जाता है कि भगवान शिव ने ‘अनीश्‍वर कथा’ पार्वती को गुफा में ही सुनाई थी। इसीलिए यह बहुत पवित्र मानी जाती है। शिव ने पार्वती को ऐसी कथा भी सुनाई थी, जिसमें यात्रा और मार्ग में पड़ने वाले स्थलों का वर्णन था। यह कथा अमरकथा नाम से विख्यात हुई।

कई विद्वानों का मत है कि शंकर जब पार्वती को अमर कथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ा, माथे के चंदन को चंदनबाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था।

अमरनाथ गुफा का सबसे पहले पता सोलहवीं शताब्दी के पूर्वाध में एक मुसलमान गड़ेरिए को चला था। आज भी चौथाई चढ़ावा मुसलमान गड़रिए के वंशजों को मिलता है।

यह एक ऐसा तीर्थस्थल है, जहां फूल-माला बेचने वाले मुसलमान होते हैं। अमरनाथ गुफा एक नहीं है, बल्कि अमरावती नदी पर आगे बढ़ते समय और कई छोटी-बड़ी गुफाएं दिखती हैं। सभी बर्फ से ढकी हैं। मूल अमरनाथ से दूर गणेश, भैरव और पार्वती के वैसे ही अलग-अलग हिमखंड हैं।

अमरनाथ जाने के दो मार्ग हैं। पहला पहलगाम होकर और दूसरा सोनमर्ग बालटाल से। जम्मू या श्रीनगर से पहलगाम या बालटाल बस या छोटे वहन से पहुंचना पड़ता है। उसके बाद आगे पैदल ही जाना पड़ता है। कमज़ोर और वृद्धों के लिए खच्चर और घोड़े की व्यवस्था रहती है। पहलगाम से जानेवाला रास्ता सरल और सुविधाजनक है।

बालटाल से पवित्र गुफा की दूरी हालांकि केवल 14 किलोमीटर है, परंतु यह सीधी चढ़ाई वाला बहुत दुर्गम रास्ता है, इसलिए सुरक्षा की नज़रिए से ठीक नहीं है, इसलिए इसे सेफ नहीं माना जाता। लिहाज़ा, ज़्यादातर यात्रियों को पहलगाम से जाने के लिए कहा जाता है।

हालांकि रोमांच और ख़तरे से खेलने के शौकीन इस मार्ग से जाना पसंद करते हैं। इस रास्ते से जाने वाले लोग अपने रिस्क पर यात्रा करते हैं। किसी अनहोनी की ज़िम्मेदारी सरकार नहीं लेती है।

दरअसल, श्रीनगर से पहलगाम 96 किलोमीटर दूर है। यह वैसे भी देश का मशहूर पर्यटन स्थल है। यहां का नैसर्गिक सौंदर्य देखते ही बनता है। लिद्दर और आरू नदियां इसकी ख़ूबसूरती में चार चांद लगाती हैं। पहलगाम का यात्री बेस केंप छह किलोमीटर दूर नुनवन में बनता है।

पहली रात भक्त यहीं बिताते हैं। दूसरे दिन यहां से 10 किलोमीटर दूर चंदनबाड़ी पहुंचते हैं। चंदनबाड़ी से आगे इसी नदी पर बर्फ़ का पुल है। यहीं से पिस्सू घाटी की चढ़ाई शुरू होती है। कहा जाता है कि पिस्सू घाटी में देवताओं और राक्षसों के बीच घमासान लड़ाई हुई, जिसमें राक्षसों की हार हुई।

यात्रा में पिस्सू घाटी जोख़िम भरा स्थल है। यह समुद्रतल से 11120 फ़ीट ऊंचाई पर है।
पिस्सू घाटी के बाद अगला पड़ाव 14 किलोमीटर दूर शेषनाग में पड़ता है। लिद्दर नदी के किनारे-किनारे पहले चरण की यात्रा बहुत कठिन होती है। यह मार्ग खड़ी चढ़ाई वाला और ख़तरनाक है। यात्री शेषनाग पहुंचने पर भयानक ठंड का सामना करता है।

यहां पर्वतमालाओं के बीच नीले पानी की खूबसूरत झील है। इसमें झांकने पर भ्रम होता है कि आसमान झील में उतर आया है। झील करीब डेढ़ किलोमीटर व्यास में फैली है। कहा जाता है कि शेषनाग झील में शेषनाग का वास है। 24 घंटे में शेषनाग एक बार झील के बाहर निकलते हैं, लेकिन दर्शन खुशनसीबों को ही नसीब होता है। तीर्थयात्री यहां रात्रि विश्राम करते हैं और यहीं से तीसरे दिन की यात्रा शुरू करते हैं।

शेषनाग से पंचतरणी 12 किलोमीटर दूर है। बीच में बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे पार करने पड़ते हैं, जिनकी समुद्रतल से ऊंचाई क्रमश: 13500 फ़ीट व 14500 फ़ीट है। महागुणास चोटी से पंचतरणी का सारा रास्ता उतराई का है।

यहां पांच छोटी-छोटी नदियों बहने के कारण ही इसका नाम पंचतरणी पड़ा। यह जगह चारों तरफ से पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियों से ढका है। ऊंचाई की वजह से ठंड भी बहुत ज़्यादा होती है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से तीर्थयात्रियों को यहां सुरक्षा के इंतज़ाम करने पड़ते हैं।

पवित्र अमरनाथ की गुफा यहां से केवल आठ किलोमीटर दूर रह जाती है। रास्ते में बर्फ ही बर्फ जमी रहती है। इसी दिन गुफा के नज़दीक पहुंचकर लोग रात बिता सकते हैं और दूसरे दिन सुबह पूजा-अर्चना कर पंचतरणी लौटा जा सकता है।

कुछ यात्री शाम तक शेषनाग वापस पहुंच जाते हैं। रास्ता काफी कठिन है, लेकिन पवित्र गुफा में पहुंचते ही सफ़र की सारी थकान पल भर में छू-मंतर हो जाती है और अद्भुत आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।

क्यों है नर्मदा नदी का हर पत्थर शिवलिंग?

नर्मदा नदी से निकलने वाले शिवलिंग को ‘नर्मदेश्वर’ कहते हैं। यह घर में भी स्थापित किए जाने वाला पवित्र और चमत्कारी शिवलिंग है; जिसकी पूजा अत्यन्त फलदायी है। यह साक्षात् शिवस्वरूप, सिद्ध व स्वयम्भू (जो भक्तों के कल्याण के लिए स्वयं प्रकट हुए हैं) शिवलिंग है। इसको वाणलिंग भी कहते हैं।

शास्त्रों में कहा गया है कि मिट्टी या पाषाण से करोड़ गुना अधिक फल स्वर्णनिर्मित शिवलिंग के पूजन से मिलता है। स्वर्ण से करोड़गुना अधिक मणि और मणि से करोड़गुना अधिक फल बाणलिंग नर्मदेश्वर के पूजन से प्राप्त होता है।
घर में इस शिवलिंग को स्थापित करते समय प्राणप्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती है। गृहस्थ लोगों को नर्मदेश्वर शिवलिंग की पूजा प्रतिदिन करनी चाहिए क्योंकि यह परिवार का मंगल करने वाला, समस्त सिद्धियों व स्थिर लक्ष्मी को देने वाला शिवलिंग है। सामान्यत: शिवलिंग पर चढ़ी कोई भी वस्तु ग्रहण नहीं की जाती, परन्तु नर्मदेश्वर शिवलिंग का प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं।

क्यों है नर्मदा नदी का हर पत्थर शिवलिंग?

स्कन्दपुराण की कथा के अनुसार:–एक बार भगवान शंकर ने पार्वतीजी को भगवान विष्णु के शयनकाल (चातुर्मास) में द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का जप करते हुए तप करने के लिए कहा। पार्वतीजी शंकरजी से आज्ञा लेकर चातुर्मास शुरु होने पर हिमालय पर्वत पर तपस्या करने लगीं। उनके साथ उनकी सखियां भी थीं। पार्वतीजी के तपस्या में लीन होने पर शंकर भगवान पृथ्वी पर विचरण करने लगे। एक बार भगवान शंकर यमुना तट पर विचरण कर रहे थे। यमुनाजी की उछलती हुई तरंगों को देखकर वे यमुना में स्नान करने के लिए जैसे ही जल में घुसे, उनके शरीर की अग्नि के तेज से यमुना का जल काला हो गया। अपने श्यामस्वरूप को देखकर यमुनाजी ने प्रकट होकर शंकरजी की स्तुति की। शंकरजी ने कहा यह क्षेत्र ‘हरतीर्थ’ कहलाएगा व इसमें स्नान से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाएंगे।

अद्वितीय है शिव की लीला

भगवान शिव यमुना के किनारे हाथ में डमरु लिए, माथे पर त्रिपुण्ड लगाये, बढ़ी हुईं जटाओं के साथ मनोहर दिगम्बर रूप में मुनियों के घरों में घूमते हुए नृत्य कर रहे थे। कभी वे गीत गाते, कभी मौज में नृत्य करते थे तो कभी हंसते थे, कभी क्रोध करते और कभी मौन हो जाते थे। भगवान शिव मदनजित् हैं, हमें उनके दिगम्बर रूप का गलत अर्थ नहीं लेना चाहिए। देवता, मुनि व मनुष्य सभी वस्त्रविहीन ही पैदा होते हैं। जिन्होंने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त नहीं की है, वे सुन्दर वस्त्र धारण करके भी नग्न हैं और इन्द्रियजित् लोग नग्न रहते हुए भी वस्त्र से ढंके हुए हैं। भगवान शिव तो काम को भस्म कर चुके हैं।

उनके इस सुन्दर रूप पर मुग्ध होकर बहुत-सी मुनिपत्नियां भी उनके साथ नृत्य करने लगीं। मुनि शिव को इस वेष में पहचान नहीं सके बल्कि उन पर क्रोध करने लगे। मुनियों ने क्रोध में आकर शिव को शाप दे दिया कि तुम लिंगरूप हो जाओ। शिवजी वहां से अदृश्य हो गए। उनका लिंगरूप अमरकण्टक पर्वत के रूप में प्रकट हुआ और वहां से नर्मदा नदी प्रकट हुईं। इस कारण नर्मदा में जितने पत्थर हैं, वे सब शिवरूप हैं। ‘नर्मदा का हर कंकर शंकर है।

’नर्मदेश्वर शिवलिंग के सम्बन्ध में एक अन्य कथा है।

भारतवर्ष में गंगा, यमुना, नर्मदा और सरस्वती ये चार नदियां सर्वश्रेष्ठ हैं। इनमें भी इस भूमण्डल पर गंगा की समता करने वाली कोई नदी नहीं है।

प्राचीनकाल में नर्मदा नदी ने बहुत वर्षों तक तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने वर मांगने को कहा। तब नर्मदाजी ने कहा–’ब्रह्मन्! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे गंगाजी के समान कर दीजिए। ‘ब्रह्माजी ने मुस्कराते हुए कहा–’यदि कोई दूसरा देवता भगवान शिव की बराबरी कर ले, कोई दूसरा पुरुष भगवान विष्णु के समान हो जाए, कोई दूसरी नारी पार्वतीजी की समानता कर ले और कोई दूसरी नगरी काशीपुरी की बराबरी कर सके तो कोई दूसरी नदी भी गंगा के समान हो सकती है। ’ब्रह्माजी की बात सुनकर नर्मदा उनके वरदान का त्याग करके काशी चली गयीं और वहां पिलपिलातीर्थ में शिवलिंग की स्थापना करके तप करने लगीं। भगवान शंकर उन पर बहुत प्रसन्न हुए और वर मांगने के लिए कहा। तब नर्मदा ने कहा–’भगवन्! तुच्छ वर मांगने से क्या लाभ? बस आपके चरणकमलों में मेरी भक्ति बनी रहे।’*

नर्मदा की बात सुनकर भगवान शंकर बहुत प्रसन्न हो गए और बोले– ’नर्मदे! तुम्हारे तट पर जितने भी प्रस्तरखण्ड (पत्थर) हैं, वे सब मेरे वर से शिवलिंगरूप हो जाएंगे। गंगा में स्नान करने पर शीघ्र ही पाप का नाश होता है, यमुना सात दिन के स्नान से और सरस्वती तीन दिन के स्नान से सब पापों का नाश करती हैं, परन्तु तुम दर्शनमात्र से सम्पूर्ण पापों का निवारण करने वाली होजाओगी। तुमने जो नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना की है, वह पुण्य और मोक्ष देने वाला होगा।’ भगवान शंकर उसी लिंग में लीन हो गए। इतनी पवित्रता पाकर नर्मदा भी प्रसन्न हो गयीं। इसलिए कहा जाता है–‘नर्मदा का हर कंकर शंकर है ।

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